बंध: प्रकार एवं लाभ- Bond: Types and Benefits

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एक विवेचना-

बंध का शाब्दिक अर्थ बंधन अर्थात एक को दूसरे से मिलाना, कसना, नियंत्रण इत्यादि ! 
इस शब्द का प्रयोग इसलिए लिए किया गया है कि इसमें शरीर के कुछ विशेष अवयवों या आंतरिक अंगो को प्राणवायु द्वारा कसक़र बांध लिया जाता है ! यह बंध शक्ति को अन्तरोन्मुख करते हैं तथा प्राणायाम में सहायक होते हैं !
साधक के शरीर में जब प्राणायाम द्वारा ऊर्जा प्रवाहित होती है तब साधक इन बँधो का उपयोग कर शक्ति को बहिर्मुख होने से बचा लेता है ! प्राणायाम द्वारा उतपन्न शक्ति को ये बंध आंतरिक अंगो में वितरण करने में सहायता करते है ! इनका अभ्यास कुंडली जागने में भी किया जाता है ! बंध का कार्य आंतरिक अंगो की गंदगी को दूर करके अधिक स्वच्छ एवं प्रासुक बनाना है ! बंध को लगाने से शरीर के अवयव पुष्ट होते हैं ! एक प्रकार की मालिश हो जाती है ! बंध शरीर की नाड़ी-विशेष को प्रोत्साहित एवं उन्हें सुचारु कर रक्तादि के मल को शुद्ध करते हैं ! इनको करने से वे सभी ग्रंथियाँ खुल जाती हैं जो हमारे शरीर में स्थित चक्रों में प्राण के प्रवाह को रोकती हैं ! इस दौरान सुषुम्ना नदी द्वारा ऊर्जा के प्रवाह को दिशा मिलती है, उच्च अभ्यासी समाधि की दशा में यह अनुभव प्राप्त करते हैं ! बंध एवं मुद्रा के प्रयोग से प्राणायाम में विशेष लाभ मिलता है ! चूँकि कुम्भक (अंतर्कुम्भक या बहिर्कुम्भक) एवं बंध प्राणायाम के लिए आव्सय्क हैं ! आठ कुम्भक लगाने की छमता बढ़ाना चाहिए !

मूल बंध-

पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाइये ! हथेलियों को घुटनों पर रखिये तथा ध्यान की अवस्था में बैठ जाइये ! मेरुदंड सीधा, नेत्र बंद, शरीर की अवस्था शिथिल और एकाग्रता मूलाधार चक्र पर !
श्वाश अंदर लीजिये, अंतर्कुम्भक लगाए ! इसी के साथ जालंधर बंध लगाए ! अब गुदा भाग और जननेंद्रिय भाव को ऊपर की ओर आकुंचन क्रिया करते हुए उन्हें ऊपर की तरफ खींचिए (आपने गाय आदि जानवर को मल त्यागने के पश्चात देखा होगा की वह किस प्रकार गुदा को अंदर की तरफ खींचते हैं) वैसे ही हमको भी अपने मूलाधार चक्र प्रदेश को खींचना है ! यही मूल बंध की अंतिम अवस्था है ! छमतानुसार रुकिए ! अधोभाग ढीला कीजिये व सिर ऊपर उठाइये एवं श्वाश छोड़िये ! यह अभ्यास बहिर्कुम्भक की अवस्थित में भी कर सकते हैं ! ५ से १० बार अनुकूलतानुसार कीजिये !

नोट-

आसन लागते समय ध्यान रहे की एड़ी का दबाव गुदा भाग में पड़े !  

विशेष-

 गलत अभ्यास के कारण शारीरिक दौर्बल्य और पौरुष का आभाव होने की आशंका रहेगी ! अशिवनि मुद्रा के अभ्यास से साधक को मूल बंध पर अधिकार जल्दी होता है !

लाभ-

1. कुंडली जागरण की क्रिया में सहायक !
2. ऊर्जा शक्ति को उर्ध्वमुखी बनता है ! फलस्वरूप चेहरे के कांति, तेज़, बल तथा वीर्य की वृद्धि होकर वृद्ध भी युवा के समान दिखाई देता है एवं उसी के समान कार्य करने की 3. छमता प्राप्त कर लेता है !
4. जननेन्द्रिय के विकार दूर होते हैं !
5. मूल बंध के निरंतर अभ्यास से प्राण अपान एवं नाद और बिंदु एक होकर योग सिद्धि एवं परमात्मा की प्राप्ति होती है !
6. जालंधर बंध के सभी लाभ भी प्राप्त होते हैं !
7. ब्रह्मचर्य साधने में सहायक !
8. गुदा संबंधी विकार दूर होते हैं जैसे अर्श, गुदा बाहर निकलना आदि !

"Bond: Types and Benefits"

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A Discussion-The literal meaning of a deliberation bond is bandhan means to unite, tighten, control, etc. with one another.
This word has been used because some special elements or internal organs of the body are tightly tied to it. These bonds are power oriented and help in pranayama.
When energy flows through the pranayama in the seeker's body, then the seeker saves energy from being extroverted by using these ties. These bonds help in distributing the power generated by Pranayama to internal organs. They are also practiced in waking up the horoscope. The work of Bandha is to remove the dirt of internal organs and make them more clean and relevant.  By applying the bandha, the components of the body are confirmed. A kind of massage takes place! Bandha encourages and smooths the pulse of the body and cleanses the stools of blood. By doing these, all those glands are opened which stops the flow of life in the chakras located in our body. During this time the flow of energy is given by the Sushumna river, high practitioners get this experience in the state of samadhi. The use of bandha and mudra gives special benefit in Pranayama. Since Kumbhak (Antarakumbhak or Bahir Kumbhak) and Bandha are necessary for Pranayama. The height of applying eight kumbhak should be increased.

-:Mool Bandh:-

Sit in Padmasana or Siddhasana! Place the palms on your knees and sit in meditation. Spinal straight, eye closed, body relaxed and concentration on Muladhara Chakra.
Take the breath inside, insert the interstitial. Put Jalandhar Bandhan with this. Now, pulling the anus and genitals upward, pulling them upwards (you must have seen how the cow, animal, after excreting it, pulls the anus inwards). Region has to be pulled. This is the last stage of the basic bond. Wait according to your opinion. Loosen the subdivision and lift up the Shir and release the breath. You can do this practice in the position of the exterminator also. Do it 5 to 10 times as per your needs.

-:Note:-

While applying posture, keep in mind that the pressure of the heel is in the anus.

-:Special:-

Due to wrong practice, there will be a possibility of physical weakness and lack of masculinity. The practice of Ashwini mudra hurts the seeker to gain authority over the original bond.

-:Benefit:-

1. Helps in the process of awakening the horoscope.
2. Energy makes energy upward! As a result, by increasing the radiance, speed, force and semen of the face, the old person also looks like a youth and achieves the ability to do the same work.
4. Disorders of genitals are overcome.
5. By continuous practice of Mool Bandha, life, soul and sound and point are united and one attains Yoga, accomplishment and God.
6. All the benefits of Jalandhar Bandha are also obtained.
7. Helps in practicing celibacy.
8. Anal disorders are overcome such as haemorrhoids, anal exudation, etc.


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