खेचरी मुद्रा, Khechari Mudra

https://www.yogadeyy.com/2020/01/khechari-mudra
साधक अपनी जिहवा को उलटी ले जाकर तालु-कुहर में स्पर्श कराएं (मुँह बंद रखते हुए) ! यह मुद्रा खेचरी मुद्रा कहलाती है ! साधक अपनी जीभ को तालू-कुहर से स्पर्श नहीं करा पता है, अतः जिहवा को बढ़ाना के तीन साधन बतलाये हैं ! छेदन, चलन और दोहन !

छेदन- 

जीभ के निचे भाग में एक सूतकार तंतु से जीभ जबड़े से जुडी हुई रहती है इस कारण जीभ को पलटकर तालु से लगाना मुश्किल हो जाता है ! इसके लिए प्रतिदिन उस तंतु को सेंधा नमक की डली से रोम मात्र छेदन करें उसके बाद सेंधा नमक और हरण का चूर्ण छेदित स्थान पर मले परन्तु योगी को लवण निषेध है इसलिए लवण के स्थान पर कत्था से कार्य करना योग्य है सात-सात दिन के अंतराल में यह क्रिया करते रहें और औषधि लगते रहें ऐसा छह महीने तक नित्य युक्ति से करते रहें तो जिहवा कपल कुहर में आसानी से पहुंच जाती है !

चालन और दोहन-

अंघूठे और तर्जनी अंगुली से या महीन (बारीक) वस्त्र से जीभ को पकड़कर चारो तरफ उलट फेरकर हिलने और खींचने को चालन कहते हैं ! मक्खन या घी आदि लगाकर दोनों हाथों की अंगुलियों से जीभ को खींचें (जैसे गाय का स्तन दोहन करते हैं) धीरे-धीरे आकर्षण करने का नाम दोहन है ! इन सब क्रियाओं में जो सुखद लगे वह गुरु-निर्देशन में करना चाहिए ! तत्प्श्चात जीभ इतनी लम्बी हो जाती है की नाशिका के ऊपर भ्रूमध्य तक पहुंच जाती है !

सावधानी-

उपरोक्त अभ्यास में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए  ! अन्यथा खतरनाक हो सकते हैं ! बिना योग्य शिक्छक के न करें!

विशेष-

ब्रह्मचर्य का पालन अवस्य करें ! सफलता की संभावना बढ़ जाती है !

लाभ-

अभ्यास हो जाने के बाद बरह्मरन्द्र से टपकने वाले मधुर रश अर्थयात अमृत का पान करता है जीभ के प्रविष्ट होने पर इड़ा पिंगला और सुषुम्ना के मार्ग खुल जाते हैं ! जिससे समाधि की स्थित उतपन्न होती है ! अमृतपान करने से साधक अपनी मृत्यु को भी वश में कर लेता है (दीर्घायु होता है) ! निद्रा, आलस्य तथा भूंख-प्यास इत्यादि अधिक नहीं सताती है !

नोट-

हमने कुछ साधक देखें हैं जो कि स्वाभाविक रूप से नित्य प्रति अभ्यास करने पर अपनी जिहवा को इतनी लम्बी कर लेते हैं की वह तालू-कुहर से स्पर्श हो जाए !

       Khechari Mudra 

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Sadhak should take his tongue in reverse and touch it in the palate of the palate (keeping the mouth closed). This currency is called Khechari Mudra. The seeker does not know how to touch his tongue with the palate, so the three means of enhancing the tongue have been told. Piercing, Trending and Tapping.

Piercing-

In the lower part of the tongue, the thread remains attached to the jaw with a thread fiber, due to which it is difficult to turn the tongue from the palate and turn it. For this, permeate the filaments daily with rock salt nuggets only after that, the rock salt and the powder of haran are sold in the perforated area, but the yogi has no salt, so working with catechu in place of salts is possible for seven to seven days interval. If you keep doing this activity in your body and keep doing this medicine regularly for six months, then the tongue gets easily in the couplet.

Movement and tapping- 

Holding the tongue with the thumb and forefinger or fine (fine) cloth, moving and pulling it back and forth, is called moving. Pulling the tongue with the fingers of both hands by applying butter or ghee etc. (like tapping the breast of a cow) is the name of attraction, slowly tapping. Whatever is pleasant in all these activities, it should be done under the guidance of Guru. After that, the tongue becomes so long that it reaches the perpendicular on top of the drug.

Caution-

Do not rush in the above exercise. Can be dangerous otherwise. Do not do without a qualified teacher.

Special-

Follow Brahmacharya Chances of success increase!

Benefits-

After the practice, the sweet rush ie dripping from Barhmarandra devours the meaning of nectar. On entering the tongue, the paths of Eda Pingala and Sushumna are opened. From which the position of samadhi arises. By consuming amritpana, the seeker also taps his death (longevity). Sleep, laziness and hunger and thirst etc. do not cause much trouble.

Note-

We have seen some seekers who naturally practice their daily tongue so long that it touches the palate.



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