ध्यान योग- Meditation yoga

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ध्यान एक महत्वपूर्ण साधना है ! इसके अभ्यास के बिना मुक्ति होना सम्भव नहीं है ! पहले के अध्यायों में जितनी भी क्रियाएं हैं वे सभी लगभग शरीरस्थ ज्यादा हैं किन्तु ध्यान आत्मा की वः क्रिया है जो साधक को ज्ञान की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि कैवल्य ज्ञान प्राप्त करती है ! ध्यान की कई क्रियांए हैं ! लगभग सभी धर्मों में ध्यान योग को महत्व दिया गया है ! जैन धर्म मानता है कि निर्विकल्प ध्यान के बिना कर्मों का छय नहीं होता है ! हिन्दू धर्मानुसार प्रतिदिन भगवत आराधना, पूजा-अर्चना व ध्यान अवश्य करना चाहिए ! ध्यान का जितना महत्व धर्मो में बताया गया है उसका इतना ही महत्व हमारे सांसारिक जीवन के लिए भी है !
अलग-अलग शास्त्रों में ध्यान की कई विधियां बताई गयी हैं ! गौरक्ष पद्धति में सूत्रकार कहते हैं की चित्त में योग शास्त्र के अनुसार विधि से निर्मलान्तर करके आत्म-तत्त्व का स्मरण करना ध्यान कहलाता है ! यह ध्यान सगुण-निर्गुण भेद से दो प्रकार का है ! श्याम वर्ण विष्णु का ध्यान करना सगुन ध्यान है ! एकांत में पवित्र स्थान पर बैठकर सिद्धासन, पद्मासन या किसी सुखासन में बैठकर कुण्डलिनी चक्रों में चित्त लगाकर या नासिका के अग्रभाग में दृष्टि लगाकर चक्र सहित ध्येय वस्तु का ध्यान लगाकर ध्यान करना निर्गुण ध्यान है ! यह ध्यान मुद्रा है तथा इसे करने वाले योगी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ! ध्यान के नव स्थानों का वर्णन करते हुए सूत्रकार नव ध्यान योग्य स्थान के प्रकार बताते हैं वे इस प्रकार हैं-
1.मूलाधार, 2.स्वाधिष्ठान, 3. नाभि (मणिपूरक), 4. अनाहत, 5. विशुद्ध, 6. घंटिका मूल, 4. लंबिका का स्थान, 8. आज्ञा चक्र, 9. सहस्त्रार चक्र

इसके ऊपर का शून्य स्थान!  योगियों द्वारा उक्ति नव स्थान ध्यानोपयोगी कहे गए हैं ! इन्हे उपाधि अर्थयात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश इन पांच तत्वों से सम्मिलित ध्यान करने से अणिमादि अष्ट सिद्धियों का उदय होता है !
विवेक चूड़ामणि में लिखा है कि जैसे सुवर्ण को अग्नि में शोधन करने से वह छार मल आदि त्यागकर शुद्ध हो जाता है इसी तरह ध्यान द्वारा सत्व रज और तमोगुण के संयोग से मलिन हुआ मन निर्मल होकर आत्म तत्व को प्राप्त हो जाता है ! विवेक चूड़ामणि में आगे लिखा है की जैसे अन्य क्रियाओं की आसक्ति को त्यागकर अर्थयात दूसरे उपयों को न करके केवल भर्मणपन का निरंतर ध्यान करते-करते कीट पतंगे आदि भर्मण के रूप में परिणित हो जाते हैं अर्थयात भर्मण (भौंरा) बन जाते हैं ऐसे ही साधक भी आत्म-आत्म तत्व का ध्यान करते-करते ईस्वर रूप पा जाते हैं ! अतः साधक ध्यान के प्रभाव से परम-आत्मा को उपलब्ध हो जाता है !

ध्यान योग

चित्त (मन) को किसी एक स्थान में ठहरना धरना है और उस ज्ञानव्रति की एकतानता ही ध्यान है ! अर्थयात जहाँ मन को लगाया जाय उसी में व्रती का का एकतार (शहद की धरा के समान) चलना ध्यान है ! ध्यान के चरम उत्कृर्ष का नाम ही समाधि है ! ध्यान जब अर्थ मात्र निर्भास होता है या ध्यान जब इतना प्रगाढ़ होता है की केवल ध्येय विषय मात्र की ही ख्याति होती रहती है तब उसे समाधि कहते हैं और जब धारणा, ध्यान तथा समाधि तीनो एक ही जगह स्थित हों तो वह संयम कहलाता है !

               Meditation yoga

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Meditation is an important practice. Salvation is not possible without its practice. All the actions in the earlier chapters are almost more bodily, but meditation is the activity of the soul which gives the seeker the best achievement of knowledge, Kaivalya knowledge. There are many creations of meditation. Meditation Yoga has been given importance in almost all religions. Jainism believes that without meditation, deeds are not affected. According to Hindu religion, one must worship Bhagavat worship, worship and meditation every day. The importance of meditation mentioned in religions is equally important for our worldly life too.
There are many methods of meditation described in different scriptures. In Gauraksha method, the sutrakaras say that according to the Yoga Shastra in the mind, remembering the self-essence by deviating from the method is called meditation. This meditation is of two types, from the virtuous-nirguna distinction. Meditating on Shyam varna Vishnu is a meditative meditation. Sitting in a sacred place in solitude, sitting in Siddhasana, Padmasana or any Sukhasana, meditating on the Kundalini Chakras or by looking at the forehead of the nasal, meditating with the meditation of the object, including the chakra, is a pure meditation. This is the meditation posture and the yogi who performs it is freed from all sins. While describing the new places of meditation, the sutrakara explains the types of newly meditative places.
1. Mooladhara, 2. Swadhisthana, 3. Navel (Manipurka), 4. Anahata, 5. Pure, 6. Ghantika Moola, 4. Place of Lumbika, 8. Commandment Chakra, 9. Sahastrar Chakra

Zero space above it. The utterances by yogis have been called the new place of meditation. The title ie Earth, Water, Fire, Air and Sky combined with these five elements meditates gives rise to the Annamadi Ashta Siddhi. 
It is written in Vivek Chudamani that just as Suvarna is purified in the fire, he purifies the stool and leaves it; similarly, by meditation, by the combination of Sattva Raja and Tamoguna, the tarnished mind becomes pure and attains the self-essence! Vivek Chudamani further writes that by abandoning the attachment of other actions, not only by means of other uses, but by constantly meditating on the nature of grapes, insects, moths etc. become the result of bhirman. Even by meditating on the self-self element, you get the form of God. Therefore, through the effect of meditational meditation, the Supreme Soul becomes available.

According to yoga formula
The mind (mind) has to stay in one place and meditation is the concentration of that knowledge. Meaning that in the mind where the mind is fixed, the fasting of the fast (like a stream of honey) is meditation! Samadhi is the name of the ultimate peak of meditation. Meditation, when the meaning is just visible, or when the meditation is so intense that only the subject matter is known, then it is called Samadhi and when the three places of Dhyana, Meditation and Samadhi are situated in the same place then it is called Sanyam.

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