योग कुंडलिनी उपनिषद in Hindi


योग कुंडलिनी उपनिषद, कुंडलिनी साधना से संबन्धित है ! योग कुंडलिनी उपनिषद की रचना काल 12वीं सदी से है ! इसमें प्राणशक्ति को जगाने के लिए प्राणायाम साधना खेचरी और मंत्र साधना करना चाहिए ! इस उपनिषद में प्रथम अद्धाय में श्लोक (मंत्र) की संख्या 87 है, दूसरे अद्धाय में कुल 49 तथा तीसरे अद्धाय में कुल 35 श्लोक हैं ! यह उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद शाखा से लिया गया है ! इस उपनिषद 3 अद्धाय हैं और कुल 171 मंत्र हैं ! पहले अद्धाय में चित्त की वृतियां, प्राणायाम एवं ब्रह्म प्राप्त के उपायों का वर्णन किया गया है ! दूसरे अद्धाय में खेचरी मुद्रा की चर्चा की गयी है, जिसके अंतर्गत स्वरूप फलश्रुति जप से खेचरी की सिद्धि, खेचरी का अभ्यासक्रम आदि का वर्णन किया गया है, इस उपनिषद में तीन बंध का वर्णन मिलता है- मूलबन्ध, उडयानबन्ध, जालंधर बंध ! चित्त की वृत्तियों के दो कारण बताये गए हैं- वासना और प्राण ! वासना नियंत्रण करने से प्राणों पर नियंत्रण और प्राण नियंत्रण से वासना नियंत्रण की बात की गयी है ! प्राणो के नियंत्रण को तीन उपाय बताये गए हैं- मिताहार आसन, शक्ति चालिनी मुद्रा ! मिताहार के बारे में पहले अद्धाय के तीसरे एवं चौथे श्लोक में खा गया है, सुमधुर आहार का सेवन करना चाहिए एवं 1/4 को पेट के वायु संचालन के लिए छोड़ देना चाहिए !

योग कुंडलिनी उपनिषद में दो प्रकार के आसन का प्रयोग किया गया है- पद्मासन, वज्रासन ! योग कुंडलिनी उपनिषद में वज्रासन की विधि अन्य ग्रंथ में बताई गयी पद्मासन के समान है ! योग कुंडलिनी उपनिषद के अनुसार पद्मासन सभी रोगों का नाश करता है ! शक्ति चालिनी मुद्रा के बारे में कहा गया है कि कुण्डलिनी चालन क्रिया द्वारा बुद्धिमान साधक, कुंडलिनी को मूलबन्ध के द्वारा ऊर्धगामी कर लेता है, योग कुंडलिनी उपनिषद के अनुसार शरीर में संचरण करने वाली वायु को प्राण कहा जाता है, उसे जब प्राणायाम के द्वारा स्थिर कहा जाता है तब संहित कुम्भक एवं कुम्भक है !


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